भरंडा के कथित धर्मांतरण विवाद पर सर्व समाज का प्रदर्शन, विरोध रैली निकालकर SDM सौंपा ज्ञापन

नारायणपुर : कभी नक्सलवाद की चुनौती से जूझने वाला अबूझमाड़ और नारायणपुर क्षेत्र अब एक नए सामाजिक विवाद के केंद्र में दिखाई दे रहा है। ग्राम भरंडा में सामने आए कथित धर्मांतरण विवाद ने केवल एक गांव या एक व्यक्ति को चर्चा में नहीं लाया, बल्कि आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपराओं और बदलती सामाजिक संरचना को लेकर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।आज नारायणपुर मुख्यालय में सर्व समाज और जनजातीय समाज के नेतृत्व में आयोजित विशाल सभा और विरोध रैली इसी बढ़ती चिंता का प्रतिबिंब थी। हजारों की संख्या में ग्रामीणों ने बाजार स्थल से कलेक्ट्रेट तक पैदल मार्च निकालकर कथित धर्मांतरण गतिविधियों के खिलाफ आवाज बुलंद की। प्रदर्शनकारियों ने “धर्मांतरण का खेल बंद करो”, “दीपक ठाकुर को गिरफ्तार करो” और “आदिवासी एकता जिंदाबाद” जैसे नारों के साथ प्रशासन पर कार्रवाई में देरी का आरोप लगाया। रैली निकालकर SDM को ज्ञापन सौंपा है।

क्या है भरंडा विवाद?

पूरा मामला 9 जून 2026 को ग्राम भरंडा से शुरू हुआ। ग्रामीणों ने एक संदिग्ध वाहन में पहुंचे तीन लोगों को रोककर पूछताछ की। इनमें से एक व्यक्ति ने अपना नाम दीपक ठाकुर बताया और बाकी दो लोगों के परिचय में एक महिला थी जो दीपक ठाकुर की पत्नी और एक अन्य व्यक्ति वाहन चालक था। ग्रामीणों के अनुसार उसने पहले स्वयं को हर्बल उत्पादों और दवाइयों का प्रचारक बताया, फिर उपचार करने वाला डाक्टर लेकिन जब वाहन में लिखे press शब्द के बारे में पूछा गया तो उसने बाद में खुद के मीडिया से जुड़े होने की बात कही।
ग्रामीणों का आरोप है कि दीपक ठाकुर उन परिवारों से संपर्क कर रहा था जो पहले से मतांतरित हो चुके हैं, उनसे बात कर सभाएँ कर रहा था और विभिन्न संदेहास्पद कार्य कर रहा था। इसी दौरान पूछे जाने पर दीपक ठाकुर ने खुद को मतांतरित बतलाया जिससे धर्मांतरण की आशंका को लेकर गांव में तनाव की स्थिति बनी और दोनों पक्षों के बीच हल्की झड़प भी हुई, जिसमें कुछ लोग घायल हुए।
पुलिस ने मौके पर पहुंचकर स्थिति को नियंत्रित किया और पूछताछ के लिए संबंधित व्यक्तियों को अपने साथ ले गई। हालांकि पुलिस के बयान अनुसार जांच में धर्मांतरण से संबंधित कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलने की बात सामने आई, जिसके बाद दीपक ठाकुर को छोड़ दिया गया।
लेकिन यहीं से विवाद ने सामाजिक और राजनीतिक स्वरूप लेना शुरू कर दिया।

आंदोलन की चेतावनी और फिर बड़ा प्रदर्शन

घटना के बाद सर्व समाज और जनजातीय समाज के प्रतिनिधियों ने पुलिस अधीक्षक से मुलाकात कर मामले में कार्रवाई की मांग की थी। साथ ही 20 जून तक कार्रवाई नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी दी गई थी।
निर्धारित समयसीमा बीतने के बाद शुक्रवार को नारायणपुर में विशाल सभा आयोजित हुई। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रार्थना सभाओं और बाहरी प्रभावों के माध्यम से जनजातीय संस्कृति को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है।
सभा के बाद निकाली गई रैली को हाई स्कूल मैदान के पास भारी पुलिस बल ने बैरिकेड लगाकर रोक दिया। इसके बाद एसडीएम को राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा गया।

ज्ञापन में भरंडा प्रकरण की निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कार्रवाई, जिले में संचालित संदिग्ध गतिविधियों की जांच तथा अब तक हुई कार्रवाई को सार्वजनिक करने जैसी प्रमुख मांगें शामिल थीं।

असली चिंता: दो विचारधाराओं में बंटता आदिवासी समाज

भरंडा विवाद केवल एक आपराधिक या प्रशासनिक मामला नहीं रह गया है। इसके केंद्र में वह सामाजिक परिवर्तन है जो पिछले कुछ वर्षों में अबूझमाड़ और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में तेजी से दिखाई दे रहा है।

एक ओर ऐसे लोग हैं जो इसे आदिवासी संस्कृति, देवी-देवताओं, पारंपरिक रीति-रिवाजों और सामुदायिक पहचान पर हमला मानते हैं। उनका कहना है कि धर्मांतरण के कारण गांवों की सामाजिक एकता प्रभावित हो रही है और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपराएं कमजोर पड़ रही हैं।
दूसरी ओर मतांतरित परिवारों का एक वर्ग है, जो इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता का विषय बताता है। यही कारण है कि अब कई गांवों में एक ही समाज के लोग अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के आधार पर दो खेमों में बंटते दिखाई दे रहे हैं।

वैसे तो यह विवाद जहां थमता हुआ नजर नहीं आ रहा है जिस प्रकार से इसमें राजनीतिक एवं सामाजिक हस्तक्षेप होने लगे हैं तो निश्चित तौर पर आने वाले समय में चुनाव के दौरान यह मुद्दा काफी बड़ा एवं संवेदनशील बन सकता है।

अबूझमाड़ के सामने नया सामाजिक संकट?

नक्सलवाद के लंबे दौर ने पहले ही अबूझमाड़ की सामाजिक संरचना को प्रभावित किया है। अब जब क्षेत्र धीरे-धीरे विकास और मुख्यधारा की ओर बढ़ रहा है, उसी समय धर्मांतरण और सांस्कृतिक पहचान का विवाद नए सामाजिक तनाव का कारण बनता दिख रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार के मामलों में समय रहते पारदर्शी जांच और संवाद की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई तो भविष्य में गांवों के भीतर सामाजिक विभाजन और गहरा सकता है।

प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती

फिलहाल पुलिस और जिला प्रशासन की प्राथमिकता क्षेत्र में शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखना है। प्रशासन के लिए चुनौती केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करने या न करने की नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों को समझने की भी है जिनके कारण समाज का एक बड़ा वर्ग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है।
भरंडा विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नारायणपुर और अबूझमाड़ में धर्म, संस्कृति और पहचान का प्रश्न अब केवल सामाजिक बहस नहीं, बल्कि संवेदनशील जनभावना का विषय बन चुका है।
अब देखना होगा कि शासन-प्रशासन इस मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या भरंडा विवाद केवल एक गांव तक सीमित रहता है या फिर यह पूरे बस्तर अंचल में धर्मांतरण और आदिवासी अस्मिता को लेकर एक बड़े विमर्श का आधार बनता है। :::

By आकाश सिंह

आकाश सिंह ठाकुर खोजी पत्रकार | नारायणपुर, छत्तीसगढ़ आकाश सिंह ठाकुर छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के निवासी हैं और विगत 5 वर्षों से सक्रिय रूप से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत हैं। वे आदिवासी अंचलों, अबूझमाड़ क्षेत्र और बस्तर संभाग से जुड़ी स्थानीय, सामाजिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक एवं जमीनी खबरों को प्रमुखता से देश-दुनिया के सामने लाने का कार्य कर रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग, जनसमस्याओं की पड़ताल, प्रशासनिक गतिविधियों की निष्पक्ष रिपोर्टिंग और हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ को मंच देना उनकी पत्रकारिता की पहचान है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों, आदिवासी समाज, ग्रामीण विकास और सामाजिक सरोकारों पर उनकी विशेष पकड़ मानी जाती है। सत्य, निष्पक्षता और जनहित को केंद्र में रखकर पत्रकारिता करना उनका मूल उद्देश्य है।

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