आज़ादी के 7 दशक बाद अबूझमाड़ के ‘तोके’ में पहली बार लहराया तिरंगा, 21 अन्य गांवों ने भी रचा इतिहास

नारायणपुर/अबूझमाड़/ ‘तोके’
छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़, जिसे अब तक देश की मुख्यधारा से कटा हुआ और ‘लाल आतंक’ का गढ़ माना जाता था, वहां आज गणतंत्र की एक नई सुबह हुई है। दशको तक नक्सलियों के काले फरमानों और खौफ के साए में जीने वाले नक्सल प्रभावित ग्राम ‘तोके’ ने आज इतिहास रच दिया। आज़ादी के बाद यह पहला मौका है जब तोके की धरती पर भारत का तिरंगा शान से लहराया और फिजाओं में ‘जन-गण-मन’ गूंज उठा। बीएसएफ (BSF) की 135वीं वाहिनी की मौजूदगी में ग्रामीणों ने न केवल गणतंत्र दिवस मनाया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि अब अबूझमाड़ में डर नहीं, बल्कि लोकतंत्र और विश्वास की बयार बह रही है।

भय से मुक्ति और राष्ट्रभक्ति का अनूठा संगम
ग्राम तोके में आज का सूर्योदय केवल एक दिन का बदलना नहीं, बल्कि एक युग का बदलना था। जिस गांव में कभी नक्सलियों का भय इतना था कि राष्ट्रध्वज फहराना तो दूर, उसके बारे में सोचना भी मना था, आज वहां के आंगनबाड़ी केंद्र और बीएसएफ कैंप में उत्सव का माहौल था।
सबसे भावुक कर देने वाला दृश्य वह था जब गांव की 70 से 80 वर्षीय बुजुर्ग माताएं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन संघर्ष और डर में बिताया, आज चेहरे पर मुस्कान लिए तिरंगे को सलामी देती नजर आईं। वहीं, नई पीढ़ी के नन्हे-मुन्ने बच्चों ने अपने हाथों में तिरंगा थामकर यह साबित कर दिया कि वे हिंसा का नहीं, बल्कि विकास और राष्ट्रप्रेम का रास्ता चुन रहे हैं।

सुरक्षा बलों पर बढ़ा अटूट विश्वास
इस ऐतिहासिक बदलाव की नींव 11 नवंबर 2025 को रखी गई थी, जब सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने यहां अपना कैंप स्थापित किया। महज कुछ महीनों में ही जवानों ने ग्रामीणों के दिल में डर की जगह विश्वास भर दिया है। समारोह के दौरान बीएसएफ 135वीं वाहिनी के असिस्टेंट कमांडेंट प्रदीप कुमार झा ने ग्रामीणों को संबोधित करते हुए कहा, “हम यहां केवल सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि आपके सुख-दुःख के साथी बनकर आए हैं।” समारोह के अंत में जवानों द्वारा ग्रामीणों और बच्चों के बीच मिठाई बांटी गई, जिसने रिश्तों में मिठास घोलने का काम किया।

विकास की ओर बढ़ते कदम और उम्मीदें
तिरंगे के नीचे खड़े होकर ग्रामीणों ने आज खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने स्वीकार किया कि कैंप खुलने के बाद सड़क निर्माण और आवास योजनाओं का काम शुरू हुआ है, जिससे उनका जीवन स्तर सुधर रहा है। हालांकि, उन्होंने पेयजल संकट, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और बच्चों के लिए स्कूल की मांग भी प्रमुखता से उठाई, जिससे यह स्पष्ट है कि अब वे अपने अधिकारों के प्रति भी जागरूक हो रहे हैं।

बदलाव की आंधी: तोके समेत इन 21 गांवों में भी पहली बार फहरा तिरंगा
केवल तोके ही नहीं, बल्कि अबूझमाड़ के 21 अन्य अति-संवेदनशील गांवों में भी कैंप स्थापना के बाद पहली बार शांत और सौहार्दपूर्ण माहौल में ध्वजारोहण किया गया। यह सूची इस प्रकार है:
| क्र. | गांव का नाम | क्र. | गांव का नाम | क्र. | गांव का नाम |
|—|—|—|—|—|—|
| 01 | एडजूम | 08 | जटलूर | 15 | बालेबेडा |
| 02 | इदवाया | 09 | धोबे | 16 | कोडेनार |
| 03 | आदेर | 10 | डोडीमार्का | 17 | कोडनार |
| 04 | कुडमेल | 11 | पदमेटा | 18 | अदिंगपार |
| 05 | कोंगे | 12 | लंका | 19 | मांदोडा |
| 06 | सितराम | 13 | परीयादी | 20 | जटवार |
| 07 | तोके (मुख्य केंद्र) | 14 | काकुर | 21 | वाडापेंदा |

अबूझमाड़ के ग्राम तोके और आसपास के 21 गांवों में मनाया गया यह गणतंत्र दिवस, महज़ एक सरकारी औपचारिकता नहीं, बल्कि ‘बुलेट पर बैलेट’ और ‘हिंसा पर विश्वास’ की जीत है। जहां कभी बारूद की गंध होती थी, आज वहां तिरंगे की शान है। 70-80 साल के बुजुर्गों की आंखों में संतोष और बच्चों के हाथों में तिरंगा यह गवाही दे रहा है कि अबूझमाड़ अब अंधेरों से निकलकर ‘न्यू इंडिया’ की रोशनी में कदम रख चुका है। प्रशासन और सुरक्षा बलों के लिए अब अगली चुनौती इन ग्रामीणों की उम्मीदों—शिक्षा, पानी और स्वास्थ्य—को पूरा कर इस विश्वास को और मजबूत बनाना होगी।
