नारायणपुर जिले के ग्राम बोरपाल में पिछले कुछ दिनों से एक बुजुर्ग के शव के अंतिम संस्कार को लेकर चल रहा गहरा विवाद अंततः परिवार की ‘घर वापसी’ के साथ शांत हो गया है। यहाँ एक मतांतरित परिवार द्वारा ईसाई रीति-रिवाज से शव दफनाने की कोशिश पर ग्रामीणों ने कड़ा ऐतराज जताया था। तनाव इतना बढ़ा कि गांव में भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा। हालांकि, ग्रामीणों की समझाइश और प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद, मृतक के पुत्र और पूरे परिवार ने लिखित में सहमति देते हुए वापस मूल आदिवासी धर्म और रूढ़ि प्रथाओं को अपना लिया है।

विवाद की जड़ और ग्रामीणों का विरोध:
घटना की शुरुआत 11 जनवरी को ग्राम बोरपाल निवासी बिरसिंह के पिता की मृत्यु के बाद हुई। बिरसिंह और उसका परिवार वर्षों पूर्व आदिवासी रीति-नीति छोड़कर ईसाई धर्म में शामिल हो गया था। पिता की मृत्यु के बाद जब परिवार ने शव का कफन-दफन ईसाई मिशनरी प्रथा से करने का प्रयास किया, तो ग्रामीण एकजुट होकर इसके विरोध में खड़े हो गए। ग्रामीणों का तर्क था कि यह क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहाँ आदिवासी समाज की स्वायत्तता और पारंपरिक रूढ़ि प्रथा सर्वोपरि है। ऐसे में गांव की सीमा के भीतर ईसाई पद्धति से अंतिम संस्कार उन्हें स्वीकार नहीं था।


पुलिस की तैनाती और सुलह की कोशिश:
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए गांव में डीएसपी स्तर के अधिकारी और बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था। पुलिस अधिकारी सुदर्शन ध्रुव ने मीडिया ब्रीफ में बताया कि 11 जनवरी से ही कानूनी असमंजस की स्थिति बनी हुई थी, क्योंकि ग्रामीण अपनी परंपराओं पर अड़े थे और परिवार अपने नए धर्म के अनुसार क्रियाकर्म करना चाहता था।


विवाद की जड़ और ग्रामीणों का विरोध:
घटना की शुरुआत 11 जनवरी को ग्राम बोरपाल निवासी बिरसिंह के पिता की मृत्यु के बाद हुई। बिरसिंह और उसका परिवार वर्षों पूर्व आदिवासी रीति-नीति छोड़कर ईसाई धर्म में शामिल हो गया था। पिता की मृत्यु के बाद जब परिवार ने शव का कफन-दफन ईसाई मिशनरी प्रथा से करने का प्रयास किया, तो ग्रामीण एकजुट होकर इसके विरोध में खड़े हो गए। ग्रामीणों का तर्क था कि यह क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहाँ आदिवासी समाज की स्वायत्तता और पारंपरिक रूढ़ि प्रथा सर्वोपरि है। ऐसे में गांव की सीमा के भीतर ईसाई पद्धति से अंतिम संस्कार उन्हें स्वीकार नहीं था।
पुलिस की तैनाती और सुलह की कोशिश:
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए गांव में डीएसपी स्तर के अधिकारी और बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था। पुलिस अधिकारी सुदर्शन ध्रुव ने मीडिया ब्रीफ में बताया कि 11 जनवरी से ही कानूनी असमंजस की स्थिति बनी हुई थी, क्योंकि ग्रामीण अपनी परंपराओं पर अड़े थे और परिवार अपने नए धर्म के अनुसार क्रियाकर्म करना चाहता था।

मंदिर में शपथ और घर वापसी:
विवाद के हल के लिए गांव के प्रमुख लोग (गायता, पटेल) और मांझी के पुजारी आगे आए। भारी दबाव और समझाइश के बाद, मृतक के पुत्र बिरसिंह ने परिवार सहित मूल धर्म में वापसी का निर्णय लिया।
इसके पश्चात, गांव के आदिवासी समाज के पूज्य देवताओं के मंदिर में विशेष विधान और पूजा-पाठ किया गया। यहाँ गायता पटेल और मांझी के सामने बिरसिंह ने पूरे परिवार के साथ लिखित और मौखिक रूप से स्वीकार किया कि वे अब मूल धर्म और आदिवासी रूढ़ि प्रथा में वापस आ गए हैं। उन्होंने भविष्य में कभी भी मूल धर्म की अवहेलना न करने और मतांतरण से तौबा करने की शपथ ली।
क्या कहा पक्षकारों ने:
बिरसिंह (मृतक का पुत्र): उन्होंने स्वीकार किया कि वह प्रार्थना सभाओं और चर्च के रिवाजों से प्रभावित होकर अपने मूल धर्म से दूर हो गए थे। लेकिन अब गांव के लोगों के आह्वान पर उन्होंने सपरिवार मूल धर्म में वापसी कर ली है और यह उन्हें स्वीकार्य है।
मंगाऊ राम कावड़े (संघ व वनवासी कल्याण आश्रम): उन्होंने इसे परिवार का साहसिक और सराहनीय निर्णय बताया। उन्होंने कहा कि 5वीं अनुसूची क्षेत्र में आदिवासी परंपराओं का संरक्षण ही समाज की प्राथमिकता है।
गुलाब बघेल (सर्व पिछड़ा वर्ग समाज अध्यक्ष): उन्होंने परिवार की वापसी का स्वागत करते हुए सभी वर्गों से आपसी भाईचारा और सौहार्द्र बनाए रखने की अपील की।

बोरपाल की यह घटना बस्तर संभाग में धर्म और परंपराओं के बीच चल रहे द्वंद का एक और उदाहरण है। हालांकि, इस मामले में संवाद और पुलिस की सूझबूझ से एक बड़ा टकराव टल गया। बीर सिंह द्वारा मूल धर्म में वापसी के बाद ग्रामीणों का आक्रोश शांत हो गया है और विवाद पूरी तरह समाप्त हो गया है। अब मृतक का अंतिम संस्कार गांव के मुख्य लोगों की देखरेख में आदिवासी रीति-नीति के अनुसार संपन्न कराया जाएगा, जिससे सामाजिक समरसता पुनः स्थापित हो सकेगी।

By आकाश सिंह

आकाश सिंह ठाकुर खोजी पत्रकार | नारायणपुर, छत्तीसगढ़ आकाश सिंह ठाकुर छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के निवासी हैं और विगत 5 वर्षों से सक्रिय रूप से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत हैं। वे आदिवासी अंचलों, अबूझमाड़ क्षेत्र और बस्तर संभाग से जुड़ी स्थानीय, सामाजिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक एवं जमीनी खबरों को प्रमुखता से देश-दुनिया के सामने लाने का कार्य कर रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग, जनसमस्याओं की पड़ताल, प्रशासनिक गतिविधियों की निष्पक्ष रिपोर्टिंग और हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ को मंच देना उनकी पत्रकारिता की पहचान है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों, आदिवासी समाज, ग्रामीण विकास और सामाजिक सरोकारों पर उनकी विशेष पकड़ मानी जाती है। सत्य, निष्पक्षता और जनहित को केंद्र में रखकर पत्रकारिता करना उनका मूल उद्देश्य है।

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