नारायणपुर: अंग्रेजों के खिलाफ ‘हूल’ यानी विद्रोह की पहली चिंगारी भड़काने वाले आदि-विद्रोही तिलका मांझी का आज शहादत दिवस है। इस अवसर पर नारायणपुर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) द्वारा एक विशेष छात्र परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में न केवल उन्हें श्रद्धांजलि दी गई, बल्कि देश की आजादी में उनके अदम्य साहस और बलिदान को भी याद किया गया।

नारायणपुर में आज अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा वीर शहीद तिलका मांझी के शहादत दिवस पर महाविद्यालयीन छात्रों के बीच एक गहन परिचर्चा सत्र का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत भारत माता और अमर शहीद तिलका मांझी के तैल चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर की गई।परिचर्चा में अभाविप के जिला संयोजक दिव्यांश जैन ने छात्रों को संबोधित करते हुए तिलका मांझी के जीवन संघर्ष पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कैसे घने जंगलों और पहाड़ों के बीच रहकर तिलका मांझी ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी थी। वहीं, नगर मंत्री अनुज पटेल ने उन्हें भारत का ‘प्रथम स्वतंत्रता सेनानी’ बताते हुए कहा कि 1857 की क्रांति से बहुत पहले ही तिलका मांझी ने वनवासियों को संगठित कर स्वतंत्रता की अलख जगा दी थी।

परिचर्चा के दौरान इस बात पर भी जोर दिया गया कि तिलका मांझी, जिन्हें ‘जबरा पहाड़िया’ के नाम से भी जाना जाता था, ने 1784 में अपने तीरों से अंग्रेज क्लीवलैंड को मार गिराया था। यह वह दौर था जब अंग्रेजों के पास बंदूकें थीं और तिलका मांझी के पास सिर्फ तीर-कमान और गुलेल। 1785 में भागलपुर में एक बरगद के पेड़ पर उन्हें फांसी दे दी गई थी, लेकिन झुकने के बजाय उन्होंने हंसते-हंसते शहादत को गले लगाया।
कार्यक्रम में उपस्थित अन्य वक्ताओं ने भी उनके साहस और बलिदान को याद करते हुए कहा कि उनका जीवन आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
इस परिचर्चा कार्यक्रम में छात्रों के भीतर देशभक्ति और अपने गौरवशाली इतिहास के प्रति गहरी रुचि देखने को मिली। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का यह प्रयास केवल एक श्रद्धांजलि सभा तक सीमित नहीं था, बल्कि यह युवा पीढ़ी को यह याद दिलाने का माध्यम था कि देश की आजादी की नींव में तिलका मांझी जैसे आदिवासियों का रक्त भी शामिल है।
